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यादों की गुलिस्तां में जननायिका सरला श्रीवास

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Phuldev Patel 

पटेल नगर, मुजफ्फरपुर। सरला श्रीवास, जितनी सरल, उतनी ही सहज भी। उनके मुक्त कंठ से स्वर फूटते कई दफा देखा था। लेकिन उनको बोलते हुए बहुत कम सुना। मिला तो अनेकों बार उनसे। जब भी मिला उस छरहरी काया वाली स्त्री रत्न से, दबी सी मुसकान मंडराते देखा उनके निश्चल आभामंडल पर। लगता था, बहुत कुछ बताना चाहती थीं वो इस मायावी लोक को। सिखाना चाहती थीं सबको इस माया के जंजाल से निबटने की कला। लेकिन नियति की नीयत अकस्मात ही धोखा दे गई। उनके अधरों को साट दिया हमेशा के लिए। प्रदेश दर प्रदेश, अपनी कला के गुल्लक को लुटाने वाली उस हुनरमंद को खामोश कर दिया सदा के लिए। 

यादों की गुलिस्तां में जननायिका सरला श्रीवास

सरला श्रीवास का जन्म 14 अगस्त 1986 को मध्य प्रदेश बालाघाट जिले के नाई परिवार में हुआ था। उनके पिता हंसराम कौशिक मूर्तिकार थे। उनकी मां अनुसुइया कौशिक और पिता दोनों ही अपने परंपरागत कार्यों के साथ ही खेती-किसानी करते थे। सरला जी को बचपन से कला में विशेष रुचि थी। लड़कपन में स्कूली पढ़ाई के दौरान वे स्थानीय कलात्मक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर शामिल होती थीं। 

यादों की गुलिस्तां में जननायिका सरला श्रीवास

मूर्तिकला में पारंगत पिता अभिनय में भी माहिर थे। वे स्थानीय स्तर पर नाटक-प्रहसन आदि में अपनी कला की छाप छोड़ जाते थे। ऐसे में कलाकारी को पसंद करने वाली सरला को उनके पिताजी का भी भरपूर सहयोग मिलता रहा। समय-समय पर जब इनके घर पर कलामंद लोग पहुंचते तो सरला उनसे भी कुछ न कुछ सीख ही लेती थीं। 

बालाघाट में आदिवासी इलाके में आवास होने के कारण उनका ताल्लुक आदिवासियों की संस्कृति से बचपन से ही रहा। लोक साहित्य, संगीत, कठपुतली, नृत्य, नाटक, भाषण में रुचि थी। स्कूली शिक्षा के दौरान ही विद्यालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर भाग लिया करती थीं। आगे चलकर उन्होंने कठपुतली कला पर कई राज्यों में काम भी किया। 

युवावस्था में महाराष्ट्र के गढ़चिरौली स्थित गोंडवाना महाविद्यालय में सरला जी सांस्कृतिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रही थीं। इसमें नाट्य प्रशिक्षण के दौरान सरला जी की चंचलता भारी पड़ गई। काम में चूक होने पर कला गुरु रामलाल भट्ट जी छात्रा सरला से सख्ती से पेश आए। चंचल सरला को उनकी सख्ती चुभ गई और उसी समय उन्होंने ठान लिया कि मुझे कलात्मक गतिविधियों में पारंगत होकर देश-दुनिया में छाप छोड़नी है। 

यादों की गुलिस्तां में जननायिका सरला श्रीवास

समय के साथ-साथ उनकी गतिविधियां पांव पसारने लगीं। 21वीं सदी में प्रवेश करने पर सरला श्रीवास सुविख्यात संगठन एकता परिषद से जुड़ीं और समाजसेवा करने लगीं। सरला जी ने आदिवासियों के अधिकार के लिए काम करना शुरू कर दिया। मानवीय समस्याओं को करीब से जानने के लिए उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में पदयात्रा, साइकिल यात्रा का सहारा लिया। 

नक्सल प्रभावित इलाके में शांति के लिए अक्टूबर 2018 में शुभ्रांशु चौधरी जी के नेतृत्व में छह राज्यों के आदिवासियों ने 186 किलोमीटर की पदयात्रा निकाली। इस पदयात्रा को मुकाम तक पहुंचाने में सरला जी ने अहम भूमिका निभायी। उन्होंने तेलंगना, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड राज्य का दौरा कर लोगों को पदयात्रा को सफल बनाने के लिए प्रेरित किया। इसके अगले साल छत्तीसगढ़ के बस्तर में शांति के लिए साइकिल यात्रा भी निकाली गई। नक्सलियों ने इस यात्रा का विरोध भी किया था। लेकिन सरला जी ने सक्रिय भूमिका निभाकर इस यात्रा को भी सफल बनाया। उन्होंने इस यात्रा में लोगों के लिए भोजन प्रबंधन पर काम किया। 

यादों की गुलिस्तां में जननायिका सरला श्रीवास

10 जुलाई 2019 में सरला जी वैवाहिक बंधन में बंध गईं।  बिहार के मुजफ्फरपुर निवासी लोक कलाकार सुनील कुमार ने सरला जी को अपना जीवनसाथी बना लिया। इसके बाद दोनों पति-पत्नी कदम से कदम मिलाकर समाज के लिए काम करने लगे। कर्मयोगी दंपती ने स्थानीय संगठनों के अलावा दूसरे प्रदेश के लोगों के लिए भी काम किया। कभी बिहार तो कभी झारखंड, कभी उड़ीसा तो कभी महाराष्ट्र। इन दोनों ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तक जाकर लोगों को जागरूक किया। 

दरअसल, वर्ष 2015 में सरला श्रीवास ने देहाती बुल्टू रेडियो स्थापित किया था। इसका काम था स्थानीय संस्कृति को दूसरे प्रदेश तक पहुंचाना, लोगों की समस्याओं का निदान करने में सहयोग करना। सीजी नेट जन पत्रकारिता जागरूकता अभियान से जुड़कर सरला जी ने वैकल्पिक मीडिया को जाना व सूचना क्रांति की ताकत को पहचाना। इसमें सुनील जी भी उनके साथ रहे। 

यादों की गुलिस्तां में जननायिका सरला श्रीवास

वर्ल्ड डिजिटल अवार्ड से सम्मानित अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार

शुभ्रांशु चौधरी के संपर्क में आकर सरला जी ने अपने देश-समाज के प्रति सामाजिक दायित्व को लेकर खुद को पूरी तरह से देश और समाज के लिए समर्पित कर दिया। दिन-रात देश समाज की चिंता व आम लोगों की समस्याओं को दूर करने के अधिकारियों से बात करना, देश के विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं को सुनना व उसके समाधान के लिए प्रयास करना सरला श्रीवास के मामूल में शामिल हो गया था। हालांकि, इन सबके बावजूद वे समय-समय पर घर जाने पर खेती-बाड़ी के अलावा बहन, भाई-भतीजा के लिए भी समय निकाल लेती थीं। 

वर्ष 2020 में सरस्वती पूजा के समय से सरला जी की सेहत नासाज रहने लगी। युवा काया पर काल की छत्रछाया मंडराने लगी। सुनील जी ने स्थानीय डॉक्टरों से संपर्क कर उनका उपचार कराया। सरला जी की सेहत नाजुक देख एसकेएमसीएच रेफर कर दिया गया। वहां डेढ़ महीना से अधिक समय तक उपचार के दौरान उनके स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव होता रहा। इस दौरान पति सुनील कुमार साये की तरह उनके साथ रहे। अंतत: 21 मार्च 2020 को अंतरर्राष्ट्रीय कठपुतली दिवस पर कठपुतली कलाकार सरला श्रीवास ने सदा के लिए इस मायावी लोक को अलविदा कर दिया। 

सरला श्रीवास की बातों और ख्वाबों से यादों की बगिया गुलजार हो गई है। लेकिन इस बगिया में विचरते ही उनकी सदेह गैरमौजूदगी की कसक टीस देने लगती है। हमसे कहने लगती है कि संभाले रखना मेरी यादों की मौजूदगी को यादों के जश्न को मैं गुलजार करती रहूंगी।

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